गुर सन कहि बरषासन दीन्हे

चौपाई २, दोहा ८० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

गुर सन कहि बरषासन दीन्हे। आदर दान बिनय बस कीन्हे॥ जाचक दान मान संतोषे। मीत पुनीत प्रेम परितोषे॥ २ ॥

अर्थ

गुरुजी से कहकर उन सबको वर्षाशन दिया और आदर, दान तथा विनय से उन्हें वश में कर लिया। फिर याचकों को दान और मान देकर सन्तुष्ट किया तथा मित्रों को पवित्र प्रेम से परितोषित किया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ८० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के वनगमन और नगरवासियों को सोता छोड़कर आगे बढ़ने का वर्णन है।

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वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना