सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई

चौपाई ३, दोहा ८५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई। असमंजस बस भे रघुराई॥ लोग सोग श्रम बस गए सोई। कछुक देवमायाँ मति मोई॥ ३ ॥

अर्थ

शील और स्नेह छोड़ा नहीं जाता। श्रीरघुनाथजी असमंजस के अधीन हो गये (दुविधा में पड़ गये)। शोक और परिश्रम (थकावट) के मारे लोग सो गये और कुछ देवताओं की माया से भी उनकी बुद्धि मोहित हो गयी।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ८५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के वनगमन और नगरवासियों को सोता छोड़कर आगे बढ़ने का वर्णन है।

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वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना