हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक

दोहा ८३ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर। पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर॥ ८३ ॥

अर्थ

करोड़ों घोड़े, हाथी, खेलने के लिये पाले हुए हिरन, नगर के [गाय, बैल, बकरी आदि] पशु, पपीहे, मोर, कोयल, चकवे, तोते, मैना, सारस, हंस और चकोर—

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना” प्रकरण का दोहा ८३ है। इस प्रकरण में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के वनगमन और नगरवासियों को सोता छोड़कर आगे बढ़ने का वर्णन है।

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वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना