गइ मुरुछा तब भूपति जागे
गइ मुरुछा तब भूपति जागे
चौपाई ३, दोहा ८१ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
गइ मुरुछा तब भूपति जागे। बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे॥ रामु चले बन प्रान न जाहीं। केहि सुख लागि रहत तन माहीं॥ ३ ॥
अर्थ
मूर्छा दूर हुई, तब राजा जागे और सुमन्त्र को बुलाकर ऐसा कहने लगे—श्रीराम वन को चले गये, पर मेरे प्राण नहीं जा रहे हैं। न जाने ये किस सुख के लिये शरीर में टिक रहे हैं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ८१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के वनगमन और नगरवासियों को सोता छोड़कर आगे बढ़ने का वर्णन है।
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वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना