अस बिचारि सोइ करहु जो भावा
अस बिचारि सोइ करहु जो भावा
चौपाई ३, दोहा ७९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
अस बिचारि सोइ करहु जो भावा। राम जननि सिख सुनि सुखु पावा॥ भूपहि बचन बानसम लागे। करहिं न प्रान पयान अभागे॥ ३ ॥
अर्थ
ऐसा विचार कर जो तुम्हें अच्छा लगे वही करो। माता की सीख सुनकर श्रीरामचन्द्रजी ने बड़ा सुख पाया। परन्तु राजा को ये वचन बाण के समान लगे। [वे सोचने लगे] अब भी अभागे प्राण क्यों नहीं निकलते !
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ७९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के वनगमन और नगरवासियों को सोता छोड़कर आगे बढ़ने का वर्णन है।
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वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना