मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न
मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न
दोहा ८० · अयोध्याकाण्ड
दोहा पाठ
मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन। सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन॥ ८० ॥
अर्थ
हे परम चतुर पुरवासी सज्जनों! आप लोग सब वही उपाय करियेगा जिससे मेरी सब माताएँ मेरे विरह के दुःख से दुःखी न हों।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना” प्रकरण का दोहा ८० है। इस प्रकरण में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के वनगमन और नगरवासियों को सोता छोड़कर आगे बढ़ने का वर्णन है।
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वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना