पितुगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी
पितुगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी
चौपाई ३, दोहा ८२ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
पितुगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी। रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी॥ एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा। फिरइ त होइ प्रान अवलंबा॥ ३ ॥
अर्थ
कभी पिताके घर, कभी ससुराल, जहाँ तुम्हारी रुचि हो, वहीं रहना। इस प्रकार तुम बहुत-से उपाय करना। यदि सीताजी लौट आयीं, तो मेरे प्राणों को सहारा हो जायगा।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ८२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम, सीता और लक्ष्मण के वनगमन और नगरवासियों को सोता छोड़कर आगे बढ़ने का वर्णन है।
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वनगमन, नगरवासियों को छोड़कर आगे बढ़ना