जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय
छन्द, दोहा ५० के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
छन्द पाठ
जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही। हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही॥ जिमिभानुबिनुदिनुप्रानबिनु तनुचंदबिनुजिमि जामिनी। तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भामिनी॥
अर्थ
जिस तरह [नगर भर का] शोक और [तुम्हारा] कलंक मिटे, वही उपाय करके कुल की रक्षा कर। हठ करके राम को वन जाते हुए लौटा ले, दूसरी कोई बात न चला। तुलसीदासजी कहते हैं—जैसे सूर्य के बिना दिन, प्राण के बिना शरीर और चन्द्रमा के बिना रात [निर्जीव तथा शोभाहीन हो जाती है], वैसे ही श्रीरामचन्द्रजी के बिना अयोध्या हो जाएगी; हे भामिनी! तू अपने हृदय में इस बात को समझ (विचार कर देख) तो सही॥
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना” प्रकरण का छन्द, दोहा ५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-दशरथ संवाद, अयोध्या का विषाद और कैकेयी को मनाने का असफल प्रयास का वर्णन है।