अस मन गुनइ राउ नहिं बोला

चौपाई २, दोहा ४५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

अस मन गुनइ राउ नहिं बोला। पीपर पात सरिस मनु डोला॥ रघुपति पितहि प्रेमबस जानी। पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी॥ २ ॥

अर्थ

राजा मन ही मन इस प्रकार विचार कर रहे हैं, बोलते नहीं। उनका मन पीपल के पत्ते की तरह डोल रहा है। श्रीरघुनाथजी ने पिता को प्रेम के वश जानकर और यह अनुमान करके कि माता फिर कुछ कहेगी [तो पिताजी को दुःख होगा]--

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-दशरथ संवाद, अयोध्या का विषाद और कैकेयी को मनाने का असफल प्रयास का वर्णन है।

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राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना