सुनि भए बिकल सकल नर नारी
सुनि भए बिकल सकल नर नारी
चौपाई ४, दोहा ४६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि भए बिकल सकल नर नारी। बेलि बिटप जिमि देखि दवारी॥ जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई। बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई॥ ४ ॥
अर्थ
इस बात को सुनकर सब स्त्री-पुरुष ऐसे व्याकुल हो गये जैसे दावानल देखकर बेल और वृक्ष मुरझा जाते हैं। जो जहाँ सुनता है वह वहीं सिर धुनने लगता है। बड़ा विषाद है, किसी को धीरज नहीं बँधता।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-दशरथ संवाद, अयोध्या का विषाद और कैकेयी को मनाने का असफल प्रयास का वर्णन है।
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राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना