लिए सनेह बिकल उर लाई
लिए सनेह बिकल उर लाई
चौपाई २, दोहा ४४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
लिए सनेह बिकल उर लाई। गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई॥ रामहि चितइ रहेउ नरनाहू। चला बिलोचन बारि प्रबाहू॥ २ ॥
अर्थ
स्नेह से विकल राजा ने रामजी को हृदय से लगा लिया। मानो साँप ने अपनी खोयी हुई मणि फिर पा ली हो। राजा दशरथजी श्रीरामजी को देखते ही रह गये। उनके नेत्रों से आँसुओं की धारा बह चली।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ४४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-दशरथ संवाद, अयोध्या का विषाद और कैकेयी को मनाने का असफल प्रयास का वर्णन है।
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राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना