भरतु न मोहि प्रिय राम समाना

चौपाई ३, दोहा ४९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

भरतु न मोहि प्रिय राम समाना। सदा कहहु यहु सबु जगु जाना॥ करहु राम पर सहज सनेहू। केहिं अपराध आजु बनु देहू॥ ३ ॥

अर्थ

[वे कहती हैं—] तुम तो सदा कहा करती थीं कि श्रीरामचन्द्र के समान मुझे भरत भी प्यारे नहीं हैं; यह बात सारा जगत जानता है। श्रीरामचन्द्रजी पर तो तुम सहज ही स्नेह करती रही हो। आज किस अपराध से उन्हें वन दे रही हो?

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-दशरथ संवाद, अयोध्या का विषाद और कैकेयी को मनाने का असफल प्रयास का वर्णन है।

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राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना