सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ

चौपाई ४, दोहा ४७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ। सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ॥ निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई। जानि न जाइ नारि गति भाई॥ ४ ॥

अर्थ

कवि सत्य ही कहते हैं कि स्त्री का स्वभाव सब प्रकार से पकड़ में न आने योग्य अथाह और भेदभरा होता है। अपनी परछाईं भले ही पकड़ जाय, पर भाई। स्त्रियों की गति (चाल) नहीं जानी जाती।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-दशरथ संवाद, अयोध्या का विषाद और कैकेयी को मनाने का असफल प्रयास का वर्णन है।

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राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना