कबहुँ न कियहु सवति आरेसू
कबहुँ न कियहु सवति आरेसू
चौपाई ४, दोहा ४९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
कबहुँ न कियहु सवति आरेसू। प्रीति प्रतीति जान सबु देसू॥ कौसल्याँ अब काह बिगारा। तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा॥ ४ ॥
अर्थ
तुमने कभी सौतिया डाह नहीं किया। सारा देश तुम्हारे प्रेम और विश्वास को जानता है। अब कौसल्या ने तुम्हारा कौन-सा बिगाड़ किया, जिसके कारण तुमने सारे नगर पर वज्र गिरा दिया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-दशरथ संवाद, अयोध्या का विषाद और कैकेयी को मनाने का असफल प्रयास का वर्णन है।
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राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना