अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ
चौपाई १, दोहा ४५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ। नरक परौं बरु सुरपुरु जाऊ॥ सब दुख दुसह सहावहु मोही। लोचन ओट रामु जनि होंही॥ १ ॥
अर्थ
जगत में चाहे अपयश हो और सुयश नष्ट हो जाय। चाहे मैं नरक में गिरूँ, अथवा स्वर्ग चला जाऊँ। और भी सब प्रकार के दुःसह दुःख आप मुझसे सहन करा लें। पर श्रीरामचन्द्र मेरी आँखों की ओट न हों।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-दशरथ संवाद, अयोध्या का विषाद और कैकेयी को मनाने का असफल प्रयास का वर्णन है।
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राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना