एक बिधातहि दूषनु देहीं
एक बिधातहि दूषनु देहीं
चौपाई १, दोहा ४९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
एक बिधातहि दूषनु देहीं। सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं॥ खरभरु नगर सोचु सब काहू। दुसह दाहु उर मिटा उछाहू॥ १ ॥
अर्थ
कोई एक विधाता को दोष देते हैं, जिसने अमृत दिखाकर विष दे दिया। नगर भर में खलबली मच गई, सब किसी को सोच हो गया। हृदय में दुःसह दाह हो गया, आनन्द-उत्साह मिट गया।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ४९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-दशरथ संवाद, अयोध्या का विषाद और कैकेयी को मनाने का असफल प्रयास का वर्णन है।
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राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना