सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम

सोरठा ५० · अयोध्याकाण्ड

सोरठा पाठ

सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित। तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी॥ ५० ॥

अर्थ

इस प्रकार सखियों ने ऐसी सीख दी जो सुनने में मीठी और परिणाम में हितकारी थी। पर कुटिला कुबरी की सिखायी-पढ़ायी हुई कैकेयी ने इस पर जरा भी कान नहीं दिया।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना” प्रकरण का सोरठा ५० है। इस प्रकरण में श्रीराम-दशरथ संवाद, अयोध्या का विषाद और कैकेयी को मनाने का असफल प्रयास का वर्णन है।

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राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना