देस काल अवसर अनुसारी

चौपाई ३, दोहा ४५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

देस काल अवसर अनुसारी। बोले बचन बिनीत बिचारी॥ तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई। अनुचितु छमब जानि लरिकाई॥ ३ ॥

अर्थ

देश, काल और अवसर के अनुकूल विचारकर विनीत वचन कहे-हे तात! मैं कुछ कहता हूँ, यह ढिठाई करता हूँ। इस अनौचित्य को मेरी बाल्यावस्था समझकर क्षमा कीजियेगा।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ४५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम-दशरथ संवाद, अयोध्या का विषाद और कैकेयी को मनाने का असफल प्रयास का वर्णन है।

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राम-दशरथ संवाद, कैकेयी को समझाना