अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू

चौपाई ३, दोहा १६५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू॥ जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानी॥ ३ ॥

अर्थ

अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू। कुसमउ समुझि सोक परिहरहू॥ जनि मानहु हियँ हानि गलानी। काल करम गति अघटित जानी॥

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १६५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-कौसल्या मिलन, करुण संवाद और गुरु वसिष्ठ के मार्गदर्शन में दशरथ की अंत्येष्टि का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि