जे अघ मातु पिता सुत मारें
जे अघ मातु पिता सुत मारें
चौपाई ३, दोहा १६७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जे अघ मातु पिता सुत मारें। गाइ गोठ महिसुर पुर जारें॥ जे अघ तिय बालक बध कीन्हें। मीत महीपति माहुर दीन्हें॥ ३ ॥
अर्थ
जो पाप माता-पिता और पुत्र के मारने से होते हैं और जो गोशाला और ब्राह्मणों के नगर जलाने से होते हैं; जो पाप स्त्री और बालक की हत्या करने से होते हैं और जो मित्र और राजाको ज़हर देने से होते हैं--।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १६७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-कौसल्या मिलन, करुण संवाद और गुरु वसिष्ठ के मार्गदर्शन में दशरथ की अंत्येष्टि का वर्णन है।
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भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि