तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं

चौपाई ४, दोहा १६८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं। बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं॥ तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ। जननी जौं यहु जानौं भेऊ॥ ४ ॥

अर्थ

जो वेदमार्ग को छोड़कर वाम (वेदप्रतिकूल) मार्ग पर चलते हैं; जो ठग हैं और वेष बनाकर जगत् को छलते हैं; हे माता! यदि मैं इस भेद को जानता भी होऊँ तो शंकरजी मुझे उन लोगों की गति दें।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १६८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-कौसल्या मिलन, करुण संवाद और गुरु वसिष्ठ के मार्गदर्शन में दशरथ की अंत्येष्टि का वर्णन है।

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भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि