मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर

दोहा १६३ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार। कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार॥ १६३ ॥

अर्थ

कौसल्याजी मैले वस्त्र पहने हैं, चेहरे का रंग बदला हुआ है, व्याकुल हैं, दुःख के बोझ से शरीर सूख गया है। ऐसी लगती हैं मानो सोने की सुन्दर कल्पलता वन में पाले से झुलस गयी हो।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि” प्रकरण का दोहा १६३ है। इस प्रकरण में भरत-कौसल्या मिलन, करुण संवाद और गुरु वसिष्ठ के मार्गदर्शन में दशरथ की अंत्येष्टि का वर्णन है।

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भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि