कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही

चौपाई ३, दोहा १६४ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही। अपजस भाजन प्रियजन द्रोही॥ को तिभुवन मोहि सरिस अभागी। गति असि तोरि मातु जेहि लागी॥ ३ ॥

अर्थ

जिसने कुल के कलंक, अपयश के भाजन और प्रियजनों के द्रोही मुझ-जैसे पुत्र को उत्पन्न किया। तीनों लोकों में मेरे समान अभागा कौन है? जिसके कारण, हे माता! तेरी यह दशा हुई!

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १६४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-कौसल्या मिलन, करुण संवाद और गुरु वसिष्ठ के मार्गदर्शन में दशरथ की अंत्येष्टि का वर्णन है।

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भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि