मातु भरत के बचन मृदु सुनि

दोहा १६४ · अयोध्याकाण्ड

दोहा पाठ

मातु भरत के बचन मृदु सुनि पुनि उठी सँभारि। लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि॥ १६४ ॥

अर्थ

भरतजी के कोमल वचन सुनकर माता कौसल्याजी फिर सँभलकर उठीं। उन्होंने भरत को उठाकर छाती से लगा लिया और नेत्रों से आँसू बहाने लगीं।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि” प्रकरण का दोहा १६४ है। इस प्रकरण में भरत-कौसल्या मिलन, करुण संवाद और गुरु वसिष्ठ के मार्गदर्शन में दशरथ की अंत्येष्टि का वर्णन है।

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भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि