लोभी लंपट लोलुपचारा

चौपाई २, दोहा १६८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड

चौपाई पाठ

लोभी लंपट लोलुपचारा। जे ताकहिं परधनु परदारा॥ पावौं मैं तिन्ह कै गति घोरा। जौं जननी यहु संमत मोरा॥ २ ॥

अर्थ

जो लोभी, लम्पट और लालची आचरण वाले हैं; जो पराये धन और परायी स्त्री की ताक में रहते हैं; हे जननी! यदि इस काम में मेरी सम्मति हो तो मैं उनकी भयानक गति को पाऊँ।

संदर्भ

यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १६८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-कौसल्या मिलन, करुण संवाद और गुरु वसिष्ठ के मार्गदर्शन में दशरथ की अंत्येष्टि का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि