जे नहिं साधुसंग अनुरागे
जे नहिं साधुसंग अनुरागे
चौपाई ३, दोहा १६८ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
जे नहिं साधुसंग अनुरागे। परमारथ पथ बिमुख अभागे॥ जे न भजहिं हरि नर तनु पाई। जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई॥ ३ ॥
अर्थ
जिनका सत्संग में प्रेम नहीं है; जो अभागे परमार्थ के मार्ग से विमुख हैं; जो मनुष्य शरीर पाकर श्रीहरि का भजन नहीं करते; जिन्हें हरि-हर (भगवान् विष्णु और शंकरजी) का सुयश नहीं सुहाता;
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा १६८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-कौसल्या मिलन, करुण संवाद और गुरु वसिष्ठ के मार्गदर्शन में दशरथ की अंत्येष्टि का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि