मोहि न लाज निज नेहु निहारी
मोहि न लाज निज नेहु निहारी
चौपाई ४, दोहा १६६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मोहि न लाज निज नेहु निहारी। राम सरिस सुत मैं महतारी॥ जिऐ मरै भल भूपति जाना। मोर हृदय सत कुलिस समाना॥ ४ ॥
अर्थ
अपने स्नेह की ओर देखकर मुझे लाज भी नहीं आती; राम-सरीखे पुत्र की मैं माता! जीना और मरना तो राजा ने खूब जाना। मेरा हृदय तो सैकड़ों वज्रों के समान कठोर है।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १६६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-कौसल्या मिलन, करुण संवाद और गुरु वसिष्ठ के मार्गदर्शन में दशरथ की अंत्येष्टि का वर्णन है।
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भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि