भरतहुँ मातु सकल समुझाईं
भरतहुँ मातु सकल समुझाईं
चौपाई २, दोहा १६७ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भरतहुँ मातु सकल समुझाईं। कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं॥ छल बिहीन सुचि सरल सुबानी। बोले भरत जोरि जुग पानी॥ २ ॥
अर्थ
भरतजी ने भी सब माताओं को पुराण और वेदों की सुन्दर कथाएँ कहकर समझाया। दोनों हाथ जोड़कर भरतजी छलरहित, पवित्र और सीधी सुन्दर वाणी बोले--।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १६७ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-कौसल्या मिलन, करुण संवाद और गुरु वसिष्ठ के मार्गदर्शन में दशरथ की अंत्येष्टि का वर्णन है।
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भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि