मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू
चौपाई १, दोहा १६६ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू। सब कर सब बिधि करि परितोषू॥ चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी। रहइ न राम चरन अनुरागी॥ १ ॥
अर्थ
उनका मुख प्रसन्न था, मन में न आसक्ति थी, न रोष (द्वेष)। सब का सब तरह से सन्तोष कराकर वे वन को चले। यह सुनकर सीता भी उनके साथ लग गयीं। श्रीराम के चरणों की अनुरागिणी वे किसी तरह न रहीं।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १६६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-कौसल्या मिलन, करुण संवाद और गुरु वसिष्ठ के मार्गदर्शन में दशरथ की अंत्येष्टि का वर्णन है।
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भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि