भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू
भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू
चौपाई २, दोहा १६९ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू। तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू॥ मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं। सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं॥ २ ॥
अर्थ
ज्ञान हो जाने पर भी चाहे मोह न मिटे; पर तुम श्रीरामचन्द्र के प्रतिकूल कभी नहीं हो सकते। इसमें तुम्हारी सम्मति है, जगत् में जो कोई ऐसा कहते हैं वे स्वप्न में भी सुख और शुभ गति नहीं पावेंगे।
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि” प्रकरण का चौपाई २, दोहा १६९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-कौसल्या मिलन, करुण संवाद और गुरु वसिष्ठ के मार्गदर्शन में दशरथ की अंत्येष्टि का वर्णन है।
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भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि