काहुहि दोसु देहु जनि ताता
काहुहि दोसु देहु जनि ताता
चौपाई ४, दोहा १६५ के अंतर्गत · अयोध्याकाण्ड
चौपाई पाठ
काहुहि दोसु देहु जनि ताता। भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता॥ जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा। अजहुँ को जानइ का तेहि भावा॥ ४ ॥
अर्थ
किसी को दोष मत दो, हे तात! विधाता ने मुझे सब प्रकार से बाम कर दिया है, जो इतने दुःख पर भी मुझे जिला रहा है। अब भी कौन जानता है, उसे क्या भा रहा है?
संदर्भ
यह अयोध्याकाण्ड के “भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १६५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में भरत-कौसल्या मिलन, करुण संवाद और गुरु वसिष्ठ के मार्गदर्शन में दशरथ की अंत्येष्टि का वर्णन है।
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भरत-कौसल्या संवाद और दशरथ की अंत्येष्टि