असुभ होन लागे तब नाना
असुभ होन लागे तब नाना
चौपाई ४, दोहा १०२ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
असुभ होन लागे तब नाना। रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना॥ बोलहिं खग जग आरति हेतू। प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू॥ ४ ॥
अर्थ
उस समय नाना प्रकार के अशकुन होने लगे। बहुत-से गधे, सियार और कुत्ते रोने लगे। जगत् के दुःख (अशुभ) को सूचित करने के लिये पक्षी बोलने लगे। आकाश में जहाँ-तहाँ केतु (पुच्छल तारे) प्रकट हो गये।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “राम-रावण युद्ध, रावण वध” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा १०२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राम-रावण के निर्णायक युद्ध और रावण वध के बाद देवताओं की जयध्वनि का वर्णन है।
पूरा प्रकरण पढ़ें
पूरा प्रकरण पढ़ें
राम-रावण युद्ध, रावण वध