जय कृपा कंद मुकुंद द्वंद हरन

छन्द १, दोहा १०३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

छन्द पाठ

जय कृपा कंद मुकुंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो। खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो॥ सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही। संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही॥ १ ॥

अर्थ

हे कृपा के कन्द! हे मोक्षदाता मुकुन्द ! हे [राग-द्वेष, हर्ष-शोक, जन्म-मृत्यु आदि] द्वन्द्वों के हरनेवाले ! हे शरणागत को सुख देनेवाले प्रभो! हे दुष्ट-दल को विदीर्ण करनेवाले! हे कारणों के भी परम कारण! हे सदा करुणा करनेवाले ! हे सर्वव्यापक विभो! आपकी जय हो। देवता हर्ष में भरे हुए पुष्प बरसाते हैं, घमाघम नगाड़े बज रहे हैं। रणभूमि में श्रीरामचन्द्रजी के अंगों ने बहुत-से कामदेवों की शोभा प्राप्त की।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “राम-रावण युद्ध, रावण वध” प्रकरण का छन्द १, दोहा १०३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राम-रावण के निर्णायक युद्ध और रावण वध के बाद देवताओं की जयध्वनि का वर्णन है।

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राम-रावण युद्ध, रावण वध