खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर

दोहा १०२ · लंकाकाण्ड

दोहा पाठ

खैंचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस। रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस॥ १०२ ॥

अर्थ

कानों तक धनुष को खींचकर श्रीरघुनाथजी ने इकतीस बाण छोड़े। वे श्रीरामचन्द्रजी के बाण ऐसे चले मानो कालसर्प हों।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “राम-रावण युद्ध, रावण वध” प्रकरण का दोहा १०२ है। इस प्रकरण में राम-रावण के निर्णायक युद्ध और रावण वध के बाद देवताओं की जयध्वनि का वर्णन है।

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राम-रावण युद्ध, रावण वध