सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच

छन्द २, दोहा १०३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड

छन्द पाठ

सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं। जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उड़ुगन भ्राजहीं॥ भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने। जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने॥ २ ॥

अर्थ

सिर पर जटाओं का मुकुट है, जिसके बीच-बीच में अत्यन्त मनोहर पुष्प शोभा दे रहे हैं। मानो नीले पर्वत पर बिजली के समूह सहित नक्षत्र सुशोभित हो रहे हैं। श्रीरामजी अपने भुजदण्डों से बाण और धनुष फिरा रहे हैं। शरीर पर रुधिर के कण अत्यन्त सुन्दर लगते हैं। मानो तमाल के वृक्ष पर बहुत-सी रायमुनियाँ चिड़ियाँ अपने विपुल सुख में मग्र हुई निश्चल बैठी हों।

संदर्भ

यह लंकाकाण्ड के “राम-रावण युद्ध, रावण वध” प्रकरण का छन्द २, दोहा १०३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राम-रावण के निर्णायक युद्ध और रावण वध के बाद देवताओं की जयध्वनि का वर्णन है।

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राम-रावण युद्ध, रावण वध