सायक एक नाभि सर सोषा
सायक एक नाभि सर सोषा
चौपाई १, दोहा १०३ के अंतर्गत · लंकाकाण्ड
चौपाई पाठ
सायक एक नाभि सर सोषा। अपर लगे भुज सिर करि रोषा॥ लै सिर बाहु चले नाराचा। सिर भुज हीन रुंड महि नाचा॥ १ ॥
अर्थ
एक बाण ने नाभि के अमृतकुण्ड को सोख लिया। दूसरे तीस बाण कोप करके उसके सिरों और भुजाओं में लगे। बाण सिरों और भुजाओं को लेकर चले। सिर और भुजा हीन रुण्ड पृथ्वी पर नाचने लगा।
संदर्भ
यह लंकाकाण्ड के “राम-रावण युद्ध, रावण वध” प्रकरण का चौपाई १, दोहा १०३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में राम-रावण के निर्णायक युद्ध और रावण वध के बाद देवताओं की जयध्वनि का वर्णन है।
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राम-रावण युद्ध, रावण वध