रीझत राम सनेह निसोतें
रीझत राम सनेह निसोतें
चौपाई ६, दोहा २८ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
रीझत राम सनेह निसोतें। को जग मंद मलिनमति मोतें॥ ६ ॥
अर्थ
श्रीरामजी तो विशुद्ध प्रेम से ही रीझते हैं, पर जगत में मुझ से बढ़कर मूर्ख और मलिनबुद्धि और कौन होगा ?
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीरामगुण और श्रीरामचरित की महिमा” प्रकरण का चौपाई ६, दोहा २८ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के गुण, चरित्र और रामकथा की पवित्रता एवं मुक्तिदायक महिमा का वर्णन है।
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श्रीरामगुण और श्रीरामचरित की महिमा