अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी

चौपाई १, दोहा २९ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी। सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी॥ समुझि सहम मोहि अपडर अपनें। सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें॥ १ ॥

अर्थ

यह मेरी बहुत बड़ी ढिठाई और दोष है, मेरे पाप को सुनकर नरक ने भी नाक सिकोड़ ली है (अर्थात्‌ नरक में भी मेरे लिये ठौर नहीं है)। यह समझकर मुझे अपने ही कल्पित डर से डर हो रहा है, किंतु भगवान्‌ श्रीरामचन्द्रजी ने तो स्वप्न में भी इस पर (मेरी इस ढिठाई और दोष पर) ध्यान नहीं दिया।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “श्रीरामगुण और श्रीरामचरित की महिमा” प्रकरण का चौपाई १, दोहा २९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के गुण, चरित्र और रामकथा की पवित्रता एवं मुक्तिदायक महिमा का वर्णन है।

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श्रीरामगुण और श्रीरामचरित की महिमा