सुनि अवलोकि सुचित चख चाही
चौपाई २, दोहा २९ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
सुनि अवलोकि सुचित चख चाही। भगति मोरि मति स्वामि सराही॥ कहत नसाइ होइ हियँ नीकी। रीझत राम जानि जन जी की॥ २ ॥
अर्थ
वर मेरे प्रभु श्रीरामचन्द्रजी ने तो इस बात को सुनकर, देखकर और अपने सुचित्तरूपी चक्षु से निरीक्षण कर मेरी भक्ति और बुद्धि की [उलटे] सराहना की। क्योंकि कहने में चाहे बिगड़ जाए (अर्थात् मैं चाहे अपने को भगवान् का सेवक कहता-कहलाता रहूँ), परंतु हृदय में अच्छापन होना चाहिये। (हृदय में तो अपने को उनका सेवक बनने योग्य नहीं मानकर पापी और दीन ही मानता हूँ, यह अच्छापन है।) श्रीरामचन्द्रजी भी दास के हृदय की [अच्छी] स्थिति जानकर रीझ जाते हैं।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “श्रीरामगुण और श्रीरामचरित की महिमा” प्रकरण का चौपाई २, दोहा २९ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में श्रीराम के गुण, चरित्र और रामकथा की पवित्रता एवं मुक्तिदायक महिमा का वर्णन है।