लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ

सोरठा ५१ · बालकाण्ड

सोरठा पाठ

लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिवँ बार बहु। बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियँ॥ ५१ ॥

अर्थ

यद्यपि शिवजी ने बहुत बार समझाया, फिर भी सतीजी के हृदय में उनका उपदेश नहीं बैठा। तब महादेवजी मन में भगवान् की मायाका बल जानकर मुसकराते हुए बोले--

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “सती का भ्रम और खेद” प्रकरण का सोरठा ५१ है। इस प्रकरण में सती का श्रीराम की दिव्यता पर संशय, परीक्षा और पश्चाताप का वर्णन है।

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सती का भ्रम और खेद