मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल

छन्द, दोहा ५१ के अंतर्गत · बालकाण्ड

छन्द पाठ

मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं। कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं॥ सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी। अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनी॥

अर्थ

ज्ञानी मुनि, योगी और सिद्ध निरन्तर निर्मल चित्त से जिनका ध्यान करते हैं तथा वेद, पुराण और शास्त्र “नेति-नेति” कहकर जिनकी कीर्ति गाते हैं, उन्हीं सर्वव्यापक, समस्त ब्रह्माण्डों के स्वामी, मायापति, नित्य परम स्वतन्त्र ब्रह्मरूप भगवान् श्रीरामजी ने अपने भक्तों के हित के लिये [अपनी इच्छासे] रघुकुल के मणिरूप में अवतार लिया है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “सती का भ्रम और खेद” प्रकरण का छन्द, दोहा ५१ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती का श्रीराम की दिव्यता पर संशय, परीक्षा और पश्चाताप का वर्णन है।

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सती का भ्रम और खेद