बहुरि राममायहि सिरु नावा

चौपाई ३, दोहा ५६ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

बहुरि राममायहि सिरु नावा। प्रेरि सतिहि जेहिं झूँठ कहावा॥ हरि इच्छा भावी बलवाना। हृदयँ बिचारत संभु सुजाना॥ ३ ॥

अर्थ

फिर श्रीरामचन्द्रजी की मायाको सिर नवाया, जिसने प्रेरणा करके सती के मुँह से भी झूठ कहला दिया। सुजान शिवजी ने मन में विचार किया कि हरि की इच्छा और भावी प्रबल है।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “सती का भ्रम और खेद” प्रकरण का चौपाई ३, दोहा ५६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती का श्रीराम की दिव्यता पर संशय, परीक्षा और पश्चाताप का वर्णन है।

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सती का भ्रम और खेद