तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा
तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा
चौपाई ४, दोहा ५० के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
तिन्ह नृपसुतहि कीन्ह परनामा। कहि सच्चिदानंद परधामा॥ भए मगन छबि तासु बिलोकी। अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी॥ ४ ॥
अर्थ
उन्होंने एक राजपुत्र को सच्चिदानन्द परमधाम कहकर प्रणाम किया और उसकी शोभा देखकर वे इतने प्रेममग्न हो गये कि अब तक उनके हृदय में प्रीति रोकने से भी नहीं रुकती।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “सती का भ्रम और खेद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ५० के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती का श्रीराम की दिव्यता पर संशय, परीक्षा और पश्चाताप का वर्णन है।
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सती का भ्रम और खेद