परम पुनीत न जाइ तजि किएँ
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ
दोहा ५६ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
परम पुनीत न जाइ तजि किएँ प्रेम बड़ पापु। प्रगटि न कहत महेसु कछु हृदयँ अधिक संतापु॥ ५६ ॥
अर्थ
सती परम पवित्र हैं, इसलिये इन्हें छोड़ते भी नहीं बनता और प्रेम करने में बड़ा पाप है। प्रकट करके महादेवजी कुछ भी नहीं कहते, परन्तु उनके हृदय में बड़ा संताप है।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “सती का भ्रम और खेद” प्रकरण का दोहा ५६ है। इस प्रकरण में सती का श्रीराम की दिव्यता पर संशय, परीक्षा और पश्चाताप का वर्णन है।
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सती का भ्रम और खेद