पुनि पुनि हृदयँ बिचारु करि धरि
पुनि पुनि हृदयँ बिचारु करि धरि
दोहा ५२ · बालकाण्ड
दोहा पाठ
पुनि पुनि हृदयँ बिचारु करि धरि सीता कर रूप। आगें होइ चलि पंथ तेहिं जेहिं आवत नरभूप॥ ५२ ॥
अर्थ
सती बार-बार हृदय में विचारकर सीताजी का रूप धारण करके उस मार्ग की ओर आगे होकर चलीं, जिससे [सतीजी के विचारानुसार] मनुष्यों के राजा रामचन्द्रजी आ रहे थे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “सती का भ्रम और खेद” प्रकरण का दोहा ५२ है। इस प्रकरण में सती का श्रीराम की दिव्यता पर संशय, परीक्षा और पश्चाताप का वर्णन है।
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सती का भ्रम और खेद