जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू

चौपाई ४, दोहा ५३ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू। पिता समेत लीन्ह निज नामू॥ कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू। बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू॥ ४ ॥

अर्थ

पहले प्रभु ने हाथ जोड़कर सती को प्रणाम किया और पितासहित अपना नाम बताया। फिर कहा कि वृषकेतु शिवजी कहाँ हैं? आप यहाँ वन में अकेली किसलिये फिर रही हैं?

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “सती का भ्रम और खेद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ५३ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती का श्रीराम की दिव्यता पर संशय, परीक्षा और पश्चाताप का वर्णन है।

पूरा प्रकरण पढ़ें

पूरा प्रकरण पढ़ें
सती का भ्रम और खेद