जैसें जाइ मोह भ्रम भारी
जैसें जाइ मोह भ्रम भारी
चौपाई २, दोहा ५२ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जैसें जाइ मोह भ्रम भारी। करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी॥ चलीं सती सिव आयसु पाई। करहिं बिचारु करौं का भाई॥ २ ॥
अर्थ
जिस प्रकार तुम्हारा यह अज्ञानजनित भारी भ्रम दूर हो, [भलीभाँति] विवेक के द्वारा सोच-समझकर तुम वही करना। शिवजी की आज्ञा पाकर सती चलीं और मन में सोचने लगीं कि भाई ! क्या करूँ (कैसे परीक्षा लूँ) ?।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “सती का भ्रम और खेद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५२ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती का श्रीराम की दिव्यता पर संशय, परीक्षा और पश्चाताप का वर्णन है।
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सती का भ्रम और खेद