बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी
बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी
चौपाई ४, दोहा ५५ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी। कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी॥ पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा। चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा॥ ४ ॥
अर्थ
फिर आँख खोलकर देखा, तो वहाँ दक्षकुमारी (सतीजी) को कुछ भी न दीख पड़ा। तब वे बार-बार श्रीरामचन्द्रजी के चरणों में सिर नवाकर वहाँ चलीं जहाँ श्रीशिवजी थे।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “सती का भ्रम और खेद” प्रकरण का चौपाई ४, दोहा ५५ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती का श्रीराम की दिव्यता पर संशय, परीक्षा और पश्चाताप का वर्णन है।
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सती का भ्रम और खेद