मैं संकर कर कहा न माना

चौपाई १, दोहा ५४ के अंतर्गत · बालकाण्ड

चौपाई पाठ

मैं संकर कर कहा न माना। निज अग्यानु राम पर आना॥ जाइ उतरु अब देहउँ काहा। उर उपजा अति दारुन दाहा॥ १ ॥

अर्थ

—कि मैंने शंकरजी का कहना न माना और अपने अज्ञान का श्रीरामचन्द्रजी पर आरोप किया। अब जाकर मैं शिवजी को क्या उत्तर दूँगी? [यों सोचते-सोचते] सतीजी के हृदय में अत्यन्त भयानक जलन पैदा हो गयी।

संदर्भ

यह बालकाण्ड के “सती का भ्रम और खेद” प्रकरण का चौपाई १, दोहा ५४ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती का श्रीराम की दिव्यता पर संशय, परीक्षा और पश्चाताप का वर्णन है।

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सती का भ्रम और खेद