जो तुम्ह कहा सो मृषा न
जो तुम्ह कहा सो मृषा न
चौपाई २, दोहा ५६ के अंतर्गत · बालकाण्ड
चौपाई पाठ
जो तुम्ह कहा सो मृषा न होई। मोरें मन प्रतीति अति सोई॥ तब संकर देखेउ धरि ध्याना। सतीं जो कीन्ह चरित सबु जाना॥ २ ॥
अर्थ
आपने जो कहा वह झूठ नहीं हो सकता, मेरे मन में यह बड़ा (पूरा) विश्वास है। तब शिवजी ने ध्यान करके देखा और सतीजी ने जो चरित्र किया था, सब जान लिया।
संदर्भ
यह बालकाण्ड के “सती का भ्रम और खेद” प्रकरण का चौपाई २, दोहा ५६ के अंतर्गत है। इस प्रकरण में सती का श्रीराम की दिव्यता पर संशय, परीक्षा और पश्चाताप का वर्णन है।
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सती का भ्रम और खेद